उत्तराखंड: के लिए यह बेहद भावुक और गर्व का क्षण था, जब मणिपुर में उग्रवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए असम राइफल्स के वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह खेतवाल का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा उनके हल्द्वानी स्थित आवास पहुंचा। जैसे ही सेना का वाहन उनके घर पहुंचा, पूरा इलाका “भारत माता की जय” और “बलवंत सिंह अमर रहें” के नारों से गूंज उठा। परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग अपने वीर सपूत को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे। तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर जैसे ही मोतीनगर स्थित आवास पहुंचा, वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। पत्नी अपने पति का पार्थिव शरीर देखकर बेसुध हो गईं। बच्चों और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। आसपास मौजूद लोगों ने परिवार को सांत्वना दी, लेकिन पूरे माहौल में गहरा शोक पसरा रहा।
सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
श्रद्धांजलि के बाद शहीद की अंतिम यात्रा पूरे सम्मान के साथ रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट के लिए निकली। रास्ते भर लोगों ने फूल बरसाकर अपने वीर सपूत को अंतिम सलाम किया। सेना के जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया और पारंपरिक सैन्य रीति-रिवाजों के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया।
सोमवार को मणिपुर के उखरुल जिले में 40 असम राइफल्स के काफिले पर उग्रवादियों ने सुनियोजित घात लगाकर हमला किया। जानकारी के अनुसार पहले सड़क किनारे शक्तिशाली IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) से विस्फोट किया गया। इसके तुरंत बाद घात लगाए बैठे उग्रवादियों ने काफिले पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। हमले के दौरान वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह खेतवाल और हवलदार चंद्रमोहन सिंह ने बहादुरी से जवाबी कार्रवाई करते हुए अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित की। इस दौरान दोनों सैनिक मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
1991 में जॉइन की थी असम राइफल्स
बलवंत सिंह खेतवाल वर्ष 1991 में असम राइफल्स में भर्ती हुए थे। तीन दशक से अधिक समय तक उन्होंने देश के विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दीं। अनुशासन, साहस और कर्तव्यनिष्ठा के कारण वे अपने साथियों और अधिकारियों के बीच सम्मानित सैनिक माने जाते थे।बलवंत सिंह मूल रूप से बागेश्वर जिले के तुपेड (वन डूंगरा) गांव के निवासी थे। बच्चों की बेहतर शिक्षा के उद्देश्य से उन्होंने लगभग 10 वर्ष पहले हल्द्वानी के मोतीनगर क्षेत्र में घर बनाया था। परिवार में पत्नी, एक बेटा और दो बेटियां हैं।बड़ी बेटी का विवाह हो चुका है। छोटी बेटी देहरादून में बीकॉम की पढ़ाई कर रही है।बेटा हाईस्कूल का छात्र है। परिवार का कहना है कि बलवंत सिंह हमेशा चाहते थे कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन में आगे बढ़ें।
शहादत की खबर मिलते ही बागेश्वर और हल्द्वानी दोनों जगह शोक की लहर दौड़ गई। जनप्रतिनिधियों, पूर्व सैनिकों, सामाजिक संगठनों और हजारों स्थानीय लोगों ने शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। लोगों ने कहा कि बलवंत सिंह का बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा।
उत्तराखंड का सैनिक परंपरा से गहरा संबंध
उत्तराखंड लंबे समय से देश को बड़ी संख्या में सैनिक देने वाला राज्य रहा है। राज्य के अनेक जवान सेना, अर्धसैनिक बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों में सेवा दे रहे हैं। सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्रों में तैनाती के दौरान कई सैनिकों ने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया है। बलवंत सिंह खेतवाल की शहादत भी उसी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा मानी जा रही है।
अंतिम संस्कार के दौरान उपस्थित लोगों ने कहा कि देश ऐसे वीर सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान का सदैव ऋणी रहेगा। सैन्य अधिकारियों ने भी उनके साहस, कर्तव्यपरायणता और देशभक्ति को नमन करते हुए कहा कि उनका बलिदान हमेशा भारतीय सुरक्षा बलों के इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाएगा।
शहीद बलवंत सिंह खेतवाल अमर रहें के नारों के बीच पूरे सैन्य सम्मान के साथ वीर सपूत को अंतिम विदाई दी गई। उनकी शहादत ने पूरे उत्तराखंड को गर्व और गहरे शोक से भर दिया।



