राजाजी टाइगर रिजर्व में बाघ पुनर्वास परियोजना का दूसरा चरण, उत्तराखंड में बाघ संरक्षण को नई दिशा

jim corbett

उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी-दक्षिणी क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना का दूसरा चरण शुरू होने जा रहा है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने कार्बेट टाइगर रिजर्व से पांच और बाघों ,तीन बाघिनों और दो बाघों को राजाजी स्थानांतरित करने की मंजूरी दे दी है। इस निर्णय से राजाजी के उस हिस्से में बाघों की स्थायी और स्वस्थ आबादी विकसित करने की दिशा में बड़ी प्रगति होने की उम्मीद है, जहां लंबे समय तक बाघों की संख्या बेहद सीमित रही थी।
राजाजी का पश्चिमी क्षेत्र लंबे समय तक बाघों की कम संख्या और प्रजनन योग्य आबादी के अभाव से जूझता रहा। इसी समस्या के समाधान के लिए NTCA के मार्गदर्शन में टाइगर ट्रांसलोकेशन (स्थानांतरण) परियोजना शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य पश्चिमी राजाजी में एक स्थायी और आनुवंशिक रूप से स्वस्थ बाघ आबादी विकसित करना था।
पहले चरण 
पहला बाघ दिसंबर 2020 में कार्बेट से राजाजी लाया गया। इसके बाद जनवरी 2021, मई 2023, मार्च 2024 और मई 2025 में अन्य बाघों का स्थानांतरण किया गया।
2020 से 2025 के बीच कुल 5 बाघ (3 बाघिन और 2 बाघ) पश्चिमी राजाजी में छोड़े गए। सभी बाघों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया और उनकी निगरानी के लिए उन्हें सैटेलाइट/रेडियो कॉलर लगाए गए।  ताकि उनकी गतिविधियों और स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखी जा सके। मई 2025 में पांचवें बाघ को मोतीचूर रेंज में छोड़े जाने के साथ परियोजना का पहला चरण पूरा हुआ था।

पहले चरण की उपलब्धियां
वन विभाग के अनुसार, स्थानांतरित बाघों में से कम-से-कम एक बाघिन ने सफलतापूर्वक शावकों को जन्म दिया, जो इस परियोजना की बड़ी सफलता मानी जा रही है। इससे यह संकेत मिला कि नया आवास बाघों के लिए अनुकूल है और प्राकृतिक प्रजनन संभव है।

दूसरे चरण में क्या होगा?
दूसरे चरण के तहत कार्बेट से 5 और बाघ लाए जाएंगे।इनमें 3 बाघिन और 2 बाघ होंगे।उन्हें पहले विशेष बाड़ों (Soft Release Enclosures) में रखा जाएगा। अनुकूलन के बाद जंगल में छोड़ा जाएगा।रेडियो कॉलर के माध्यम से उनकी गतिविधियों और स्वास्थ्य की निगरानी की जाएगी।
इस परियोजना का महत्व केवल बाघों तक सीमित नहीं है। बाघ किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र के शीर्ष शिकारी (Apex Predator) होते हैं। उनकी उपस्थिति पूरे खाद्य श्रृंखला और जैव विविधता के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब किसी क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ती है, तो शिकार प्रजातियों जैसे चीतल, सांभर और जंगली सूअर की आबादी भी संतुलित रहती है। इससे जंगल की वनस्पति और प्राकृतिक संसाधनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
राजाजी टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या पर्यटन के लिए भी लाभदायक साबित हो सकती है। उत्तराखंड में वन्यजीव पर्यटन एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है और बाघों की बेहतर उपस्थिति देश-विदेश से अधिक पर्यटकों को आकर्षित कर सकती है। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा होंगे।

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Author: uttarakhandtime

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