गोमुख-केदारताल में बन रहीं छोटी ग्लेशियर झीलों पर बढ़ी चिंता

गोमुख-केदारताल

उत्तरकाशी। गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख और केदारताल क्षेत्र में ग्लेशियर के मलबे के बीच बन रही छोटी-छोटी झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश होने के कारण इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय पर्यावरणविदों और गंगा संरक्षण से जुड़े लोगों ने इन झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन कराने के साथ नियमित निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की मांग की है।

हालिया हिमालयी आपदा की घटनाओं के बाद गोमुख और केदारताल क्षेत्र में बन रही इन झीलों को लेकर चर्चा तेज हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समुद्रतल से करीब चार से पांच हजार मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम के बदलते पैटर्न के कारण अब बारिश की स्थिति पहले की तुलना में अलग दिखाई दे रही है। ऐसे में ग्लेशियर और उसके आसपास बने जलभराव वाले क्षेत्रों की निगरानी जरूरी है।

ग्लेशियर के मलबे पर बनी हैं छोटी झीलें

गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख क्षेत्र में गंगा के उद्गम के आसपास ग्लेशियर के मलबे के बीच कई छोटी जलराशियां दिखाई दे रही हैं। इसी तरह केदारताल क्षेत्र में भी ग्लेशियर और उसके आसपास छोटे जलभराव वाले क्षेत्र बने हुए हैं।

पर्यावरणविद सुरेश भाई का कहना है कि गंगोत्री घाटी और आसपास का ग्लेशियर क्षेत्र पहले से ही संवेदनशील है। ऐसे में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बदलते मौसम और बारिश के प्रभाव को देखते हुए इन झीलों की स्थिति का वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया जाना चाहिए।

गहन अध्ययन और अर्ली वार्निंग सिस्टम की मांग

गंगा विचार मंच के प्रांत संयोजक लोकेंद्र बिष्ट और गोमुख से लौटे ग्राम प्रहरी प्रखर बिष्ट ने सरकार से इन झीलों का गहन अध्ययन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि झीलों में पानी का स्तर, उनके आकार और आसपास के ग्लेशियर-मलबे की स्थिति की लगातार निगरानी की जानी चाहिए।

उन्होंने संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की भी मांग की है, ताकि किसी अप्रत्याशित घटना की स्थिति में निचले क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी पहुंचाई जा सके।

वैज्ञानिकों के अनुसार अधिकांश झीलें अस्थायी

वहीं, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक मनीष मेहता के अनुसार गोमुख और आसपास दिखाई देने वाली ये झीलें सुप्रा-ग्लेशियल झीलें हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस तरह की कई झीलें अस्थायी प्रकृति की होती हैं और समय के साथ इनका स्वरूप बदल सकता है। इसलिए केवल झीलों की मौजूदगी को अपने आप में बड़ी आपदा का संकेत नहीं माना जा सकता।

हालांकि, ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर, पानी और मौसम की परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। ऐसे में इन झीलों की वास्तविक स्थिति, पानी की मात्रा और संभावित जोखिम का आकलन वैज्ञानिक निगरानी के आधार पर किया जाना जरूरी है।

फिलहाल स्थानीय लोगों की मांग है कि गोमुख और केदारताल क्षेत्र में बनी इन झीलों का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए और संवेदनशील स्थानों पर निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए।

 

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Author: uttarakhandtime

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